अब देश की वर्तमान पीढ़ी चाहे तो शर्मसार होसकती है कि हम जनसंख्या के स्तर पर अगले छह वर्षों के भीतर ही चीन को भी मात दे देंगे। अकेला उत्तर प्रदेश ही आबादी के मोर्चे पर पड़ोसी पाकिस्तान जैसे बड़े देश तक को पीछे छोड़ चुका है। ये दोनों ही आंकड़ें भयावह हैं। ऐसी हालत में देश के प्रगति करने का कोई मतलब नहीं रह जाता, यदि हम अपनी भयावह रूप से बढती आबादी को रोक पाने में ही असफल रहें। दुर्भाग्य से ऐसी स्थिति ही हमारे यहां हो गई है। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिर्पोट में भी दावा किया गया है कि भारत की जनसंख्या 2024 के आसपास चीन से भी अधिक हो जाएगी। महत्पूर्ण है कि चीन हमारे से क्षेत्रफल के हिसाब से वर्तमान भारत से तीन गुना अधिक बड़ा देश है। यह सारी स्थिति भी तब है जब हमारे यहां जनसंख्या नियंत्रण का कार्यक्रम सन 1951 से ही चल रहा हैं। चल रहा है या रेंग रहा है यह तो अनुसन्धान का विषय है I देश की कई पीढ़ियां हम दोहमारे दो के नारे को सुन-सुनकर ही बडी हुई हैं। चीन ने 1970 के आसपास जनसंख्या नियंत्रण पर फोकस करना शुरू किया था। पर हमारे विपरीतवहां पर इस दिशा में सख्ती से कदम बढ़ाए गए थे। उसके बाद से उन्होंने अपनी 40 करोड़ आबादी को बढ़ने से रोका। यह वास्तव में एक बहुत ही बड़ा आंकड़ा है। इस तरह का दावा चीन ने आधिकारिक तौर पर किया है। पर हमारे भारत वर्ष में तो तेजी से बढ़ती आबादी को रोकने के सारे कार्यक्रम अबतक विफल ही रहे। और क्या कोई यह मानने से इंकार करेगा कि देवी और सीता को अराध्य मानने वालेभारतीय समाज में बेटे को पाने की तीव्र इच्छा बनी रहती है?इस मानसिकता के कारण भी पति-पत्नी पर  बेटा पैदा करने का दबाव बना रहता है। बेटा पाने के लिए लोग अनेक बच्चे पैदा करते रहते हैं। फिर कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी आबादी को रोकने की बजाय उसे बढ़ाने का बेशर्मी से आहवान तक कर दिया है। आपको याद होगा ही कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने 2015 में अपने राज्य की जनता का आहवान किया था कि वे अधिक से अधिक बच्चे पैदा करें ताकि उनकी संपत्ति और भूमि पर कोई बाहरी कब्जा न जमा सके। आप कल्पना कर सकते हैं कि कितनी गैर-जिम्मेदराना और लचर सोच रखते हैं देश के कुछ नेता। आप खबरिया टीवी चैनलों पर रोज धार्मिक नेताओं को एक-दूसरे को अपशब्द कहते सुनते रहते हैं। ये मंदिर-मस्जिद के मुद्दों पर लड़ते रहते हैं। पर मजाल है कि इनमें से कोई अपने धर्मावलंबियों को बच्चे कम पैदा करने के लिए भी कहे। याद रखिए कि ये धर्म और संप्रदाय का मसला अब नहीं रह गया है जिसे कि कठमुल्ले कुप्रचार करते हैं I यह हमारे जीवन-मरण का प्रश्न है I

त्राहि-त्राहि करता देश

आज तो अपने देश में हर तरफ भीड़ ही भीड़ दिखाई देती है। रेलवे स्टेशनबस स्टैंडबाजार,मंदिरशॉपिंग मॉल्ससड़कों पर मुंड ही मुंड अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे होते हैं। हर तऱफ भीड़ का दिखनाकई बारडराता भी है। जेहन में सवाल पैदा होने लगते है- कि किस तरह से देश इतनी अपार और चक्रवृद्धि ब्याज से भी तेज रफ्तार से बढ़ती आबादीके लिए अनाज,रोजगार,शिक्षा,स्वास्थ्य औरअन्यदूसरी सुविधाएं उपलब्ध करवा पाएगा? ये ठीक है कि भारत ने बीते कुछ दशकों केदौरान विज्ञान और तकनीकमेडिसिन और स्वास्थ्य सेवा,सूचना प्रौद्योगिकीबिजनेससंचारनोरंजन आदि क्षेत्रों में लंबी छलांग लगाई है। पर आबादी की रफ्तार के कारण देश को उन उपलब्धियों से अपेक्षित लाभ नहीं हो रहा है,जो देश ने दर्ज की है। इस बीच,असम आबादी रोकने के लिहाज से एक नजीर रख रहा है। असम सरकार ने नयी जनसंख्या नीति का मसौदा तैयार किया है। इसके अनुसारदो से अधिकबच्चे पैदा करनेवालों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। असम सरकार ने निश्चित रूप से समूचे देश के सामनेएक अनुकरणीयउदाहरण पेश किया है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि वो आबादी पर लगाम लगाने के लिए कृतसंकल्प है। असम मेंअनधिकृतघुसपैठ के कारण भी आबादी बेलगाम तरीके से बढ़तीहीजा रही है।

एक बच्चा या असम का मार्ग

अब भारत के सामने एकही विकल्प है। हम अगले पचास वर्षों के लिए या जबतक आबादी सौ करोड़ से निचे आकर स्थिर न हो जाये एकबच्चा नीति” ही देश में चलें। अबहम दो-हमारे दो का दौर बीते दिनों की बात हो चुकी है।अगर इस बिन्दु पर आम राय नहीं बनती है तो कम से कमसारा देश असम के रास्ते पर तो चल ही सकता है। याद ऱखिए कि जनसंख्या सी तरह से बढ़ती रही तो आने वाली पीढ़ियां खाद्यानपीने का पानी और साफ हवा सहित कई प्राथमिक संसाधनों और रोजगार के लिए तरसेगी। यहतो कोईनहीं कह रहा कि देश में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सरकार या गैर-सरकारी स्तरों पर पहल नहीं हो रही। बिल्कुल हो रही हैं।लेकिनजितनी जरूरत है उतनी भी नहीं हो रही है I इस कार्य में और ईमानदारी और गति लाने की आवश्यकता है। बेशकजनसंख्या नियंत्रण के लिए जो बड़े कदम उठाए जा चुके हैं उन्हें और गंभीरता से लागू करना होगा। महिलाओं और बच्चियों के कल्याण और उनकी स्थिति को बेहतर करनाशिक्षा के प्रसारगर्भनिरोधक और परिवार नियोजन के तरीके,  पुरुष नसबंदी को बढ़ावा आदि कुछ ऐसे कदम हैं जिसके चलते आबादी पर काबू पाया जा सकता हैं।

क्यों बढ़ते जाते हम

दरअसलअनियंत्रित आबादी के बहुत से कारण हैं। इनमें जन्म दर का मृत्यु दर से अधिक होना तथाअशिक्षा बड़े कारण हैं। सबसे अहम कारण निरक्षरता है।निरक्षरता के कारण देश की एक बड़ी आबादी बच्चे पैदा करती रहती है। उसेछोटा परिवार-सुखी परिवार’ का महत्व समझ ही नहीं आता। इसलिए जनसंख्याविस्फोट के मूल में एक बड़ा कारण हमारे यहां करोड़ों लोगों का अनपढ़ होना भी है। आबादी बढ़ना उसके लिए इसलिए निरक्षरता पर करारा प्रहार करना होगा।इसके अलावादेश में  प्रजनन दर कम तो हुई है पर फिर भी यह दूसरे देशों के मुकाबले बहुत अधिक है।  आबादी के तेजी से बढ़ने का एक अन्य कारण गरीबी भी है। गरीब परिवारों में एक धारणा है कि परिवार में जितने ज्यादा सदस्य होंगे उतने ज्यादा लोग कमाने वाले होंगे। इसके अलावा भारत अब भी गर्भ निरोधकों और जन्म नियंत्रण विधियों के इस्तेमाल में पीछे है। भारत में आबादी को गति देने में घुसपैठियों का भी कम दोषी नहीं है।असम और अन्यभारतीय राज्यों में करोड़ों बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे हैं।

कहने वाले दावा करते हैं कि भारत में तीन-चार करोड़ बांग्लादेशी नागरिक आ गए हैं। इन्हें आप देश के हर शहर में छोटा -मोटा काम करते हुए देख सकते हैं। ये आपराधिक मामलों में भी लिप्त रहते हैं। दिल्ली के कई इलाकों में इनका आतंक है। इन्होंने ही जनकपुरी इलाके में कुछ समय पहले एक डाक्टर को सरेशाम मार डाला था।  पश्चिम बंगाल में भी अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों का मुद्दा काफ़ी संवेदनशील है।राज्य के सबसे अधिक मुस्लिम बहुल ज़िले मुर्शिदाबाद से सटे सीमावर्ती इलाक़ों की सबसे बड़ी समस्या ये है कि कथित बांग्लादेशियों और मूल स्थानीय निवासियों का रहन-सहन और भाषा एक जैसी है। घुसपैठिये देश के संसाधनों पर बोझ बन रहे हैं। इसलिए घुसपैठ तो रोकनी ही होगी।

चूंकि जनसंख्या वृद्धि में हम सबको पीछे छोड़ते जा रहे हैंये क्रम अनिश्चितकाल तो नहीं जारी रह सकता। अब सरकार और समाज को आबादी को रोकने और कम करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। अब और विलंब देश को बर्बादी के कगार पर ले जाएगा। अब एक परिवार एक बच्चा की निति पर ही अमल करना उचित जान पड़ता है।