Wednesday 25 May 2022
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ग़रीबी ऐसे नहीं हटती

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चार दशक पहले इंदिरा गाँधी ने नारा दिया था ‘ग़रीबी हटाओ’, जिसे पिछले चुनाव में और अब भी उनके पोते राहुल गाँधी लगातार दोहरा रहे हैं। इस बीच लगभग 34 साल सरकार कांग्रेस की थी या कांग्रेस के सहयोग से थी। बाकी 6 साल भाजपा और गठबंधन दलों की सरकार रही।

आज भाजपा हो या कांग्रेस — सभी पार्टियाँ ग़रीबी हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं लेकिन ग़रीबी है कि हटने का नाम ही नहीं लेती! हर साल लगभग रु० 3 लाख करोड़ विभिन्न मदों में ग़रीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले 30 करोड़ लोगों (सरकारी आंकड़ा) के लिए ख़र्च किया जाता है, यानी पिछले दस साल में प्रति व्यक्ति ख़र्च एक लाख रुपया बैठता है। अगर एक परिवार को 5 सदस्यों का मान लिया जाए तो प्रति परिवार रु० 5 लाख सरकार दे चुकी है। लेकिन ग़रीबी है कि तब भी जमी हुई है। अभी हमने इस मद में वह आंकडा नहीं जोड़ा है जो ग़ैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा आम जन और कॉर्पोरेट के सहयोग से ग़रीबों को मदद के रूप में दिया जाता है। (आपकी जानकारी के लिए, देश में कारोबार करने वाला हर बड़ा औद्योगिक घराना अपने मुनाफ़े का एक नियत हिस्सा ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्पोंसिबिलिटी’ स्कीम के तहत समाज सेवा में लगाता है ताकि उन्हें सरकारी मदद और रेटिंग एजेंसियों द्वारा बेहतर रेटिंग मिल सके, और यह रक़म खरबों में है।)

तो आख़िर ऐसा क्या है कि ग़रीबी अब भी वहीँ है जहाँ आज़ादी के पहले दशक में थी? इसका जवाब आपके आसपास ही मिल सकता है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।

CHENNAI : 13/09/2008 : Female houselhold labour cleaning vessels and washing clothes at Thiruvanmiyur. Photo : N_Sridharan
चेन्नई के तिरुवनमियुर में काम करती एक ‘बाई’/ चित्र — एन श्रीधरन

आपकी ‘कामवाली बाई’ सुबह आती है और आपके घर का काम करने के बदले में कुछ पैसे हर महीने लेकर जाती है। रोज़ आपके बच्चों को अच्छे कपड़े पहनकर स्कूल जाते देख वह भी वही सपना देखती है जो हर निम्न और मध्यम वर्गीय परिवार की आँखों में पलता है — अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का — ताकि वे अपने जीवन में कुछ कर सकें।

लेकिन ‘पगार’ मिलने के दिन उसके घर के चाय-पत्ती, चीनी और दाल के डिब्बों में छुपाकर रखे गए पैसे उसका दारूबाज़ पति या कई मामलों में परिवार का कोई अन्य सदस्य ले जाता है और वह कुछ नहीं कर पाती। विरोध करने पर शारीरिक हिंसा के क़िस्से आम हैं (सच्ची घटना के आधार पर)।

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चित्र — रॉयटर्स

आपके ऑफ़िस के नीचे बनी सार्वजनिक पार्किंग में रोज़ की तरह कुछ बच्चे आपसे भीख मांगते हैं और आप रुक जाते हैं क्योंकि आज आपको 5-6 साल की उम्र का एक नया बच्चा दिखता है। आप उसे भी वही कहते हैं जो आप बाकी बच्चों को पहले कह चुके हैं — ‘सुबह-सुबह मेरे ऑफिस में एक झाड़ू पोछा लगाने की ज़िम्मेदारी ले तो मैं तुझे महीने की पगार दूंगा और यह काम केवल आधे घंटे का है’ (आप जानते हैं यह ग़ैरकानूनी है, लेकिन आप उसे भिखारियों के झुण्ड से बाहर निकालना चाहते हैं, अगर वह इसके लिए तैयार है तो शायद आप उसके स्कूल का ख़र्च भी उठा सकें।) लेकिन वह इनकार कर देता है। आप फिर भी उसके चेहरे की मासूमियत के कारण उसे दस रुपये देकर अपनी गाडी में जा बैठते हैं।

जब आप गाड़ी पार्किंग से निकल रहे होते हैं तभी आप देखते हैं कि वही बच्चा आपके द्वारा दिए गए रुपयों को एक दूसरे लड़के को दे रहा है जिसकी उम्र 15 से 25 के बीच कुछ भी हो सकती है और जिसके हाथ में जलती सिगरेट का होना अनिवार्य है। आप सारी कहानी समझ जाते हैं और चुपचाप नज़रें चुराकर गाड़ी सडक पर मोड़ देते हैं। यह बच्चा कभी भिखारियों के झुण्ड से बाहर नहीं निकल पायगा। (सत्य घटना)

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चित्र — पी टी आइ

तीसरी घटना 16 जून 2013 को उत्तराखंड के केदारनाथ में आई आपदा के बाद की है, जिसमें लगभग 6,000 लोग मारे गये थे। एक साल बाद जून 2014 में एक बड़े अख़बार के सहयोग से देश के अलग-अलग भागों से पाठकों और दानदाताओं के द्वारा इकट्ठी की गई रक़म से आपदा-प्रभावित 15 ऐसे परिवारों के लिए मकान बनाये गए हैं जिनके परिवार में कोई पुरुष ज़िन्दा नहीं बचा है। रुद्रप्रयाग ज़िले के 4 दूरस्थ गावों के विभिन्न परिवारों को ये मकान दिए गए हैं।

जून 2015 आते-आते इनमे से 11 परिवार इन दान के मकानों से खदेड़ दिए गए हैं और यह काम डंडे के दम पर किया गया है। (थाने की दूरी 9 किमी जो 5 घंटे पैदल का रास्ता है, न्यायालय 11 घंटे के सफर पर, उच्च न्यायालय जाने के लिए दो दिन चाहिए) पुलिस चुप है और वकीलों की फीस परिवार के माद्दे के बाहर की बात है। (सत्य घटना)

इन तीनों मुआमलों में समाज का ताना बाना और सामाजिक संगठन जहाँ ग़रीबी हटाने में सहयोगी नजर आते हैं वहीँ ज़ोर-ज़बरदस्ती और अन्याय के ख़िलाफ़ सरकारी मदद ग़ायब दिखती है। पहले मुआमले में जहाँ पुलिस का रवैया बिना मुआमले की गंभीरता को देखे इसे पारिवारिक विवाद बताकर घर की चारदीवारी में सुलझाने की हिदायत देने का रहता है, वहीँ दूसरे मामले में इस तरह के भीख के रैकेट पुलिस की जानकारी में चलते हैं। तीसरे मुआमले में सामाजिक दबाव और प्रिंट मीडिया के हल्ले-गुल्ले के बाद अगर पुलिस कुछ करे भी तो कानूनी कार्यवाही में लगने वाला समय और ख़र्च पीड़ित परिवार को न्याय से दूर धकेल देता है। तो क्या सरकारी और ग़ैर-सरकारी मदद ग़लत रास्ते पर जा रही है? शायद नहीं। सरकारी और ग़ैर-सरकारी मदद ग़रीबी हटाने के लिए ज़रूरी हैं लेकिन साथ ही सरकारी मशीनरी का ग़रीबों को न्याय दिलाने के लिए तत्पर होना भी ज़रूरी है।

हम ऐसे समाज में हैं जहाँ छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े के दंतेवाडा ज़िले के एक गाँव की स्कूल टीचर सोनी सोरी को पुलिस एक दिन अचानक माओवादी होने के शक में उठाकर ले जाती है और उन्हें लगातार कई दिन तक यातनाएं दी जाती हैं (इन यातनाओं में गुप्तांगों में रेत और पत्थर डालना भी शामिल है)। इसके बाद चले केस में न्यायालय द्वारा जहाँ सोनी सोरी को निर्दोष बताया जाता है वहीँ सोनी सोरी पर पुलिसिया ज़ुल्म को भी सुबूतों के अभाव में नहीं माना जाता। आप ख़ुद सोचिये पुलिस कस्टडी में दी गई यातनाओं के लिए क्या सुबूत हैं जो आप दे सकते हैं? कोई गवाह जो केवल कोई पुलिस का व्यक्ति ही हो सकता है? कोई मेडिकल रिपोर्ट जिसे इसी सरकारी मशीनरी का हिस्सा रहने वाला डॉक्टर जारी करेगा? और इस सबके बाद भी क्या हुआ? सोनी सोरी एक सामाजिक आन्दोलन से बनी पार्टी के लिए केवल एक चुनावी मोहरा बनकर रह गई। आम आदमी पार्टी ने सोनी सोरी को अपना लोकसभा चुनाव प्रत्याशी बनाया लेकिन किसी भी बड़े नेता ने उनके पक्ष में प्रचार करने की ज़हमत नहीं उठाई। सोनी सोरी शहरी सीटों पर मुद्दा बनी पर उनकी अपनी सीट पर वे केवल मोहरा भर बनकर रह गईं।

क्या अब भी आप नहीं सोचना चाहेंगे कि बरसों से लंबित पड़े न्याय सुधार और पुलिसिया सुधार आख़िर क्यों नहीं हो रहे? यही वे सुधार हैं जो देश से ग़रीबी हटा सकते हैं अन्यथा आप मदद कीजिये और फोटो खिंचवाइये। लेकिन जैसे ही आप वहां से निकलेंगे आपके द्वारा दी गई मदद को कोई बाहुबली हथिया लेगा और आप फ़ेसबुक पर फ़ोटो डालकर अपने ‘दानवीर’ होने का ढिंढोरा पीटते रहेंगे। प्रधानमंत्री विभिन्न राज्यों में अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुसार राहत पॅकेज की घोषणाएं करते रहेंगे और आप तालियाँ बजाकर इसका स्वागत करते रहेंगे लेकिन ग़रीबी जस की तस बनी रहेगी। और आपकी आने वाली पीढ़ी भी इसी दुश्चक्र में फंसी रहेगी।

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Satish Sharma
Satish Sharmahttp://thesatishsharma.com/
Chartered accountant, independent columnist in newspapers, former editor of Awaz Aapki, activist in Anna Andolan, based in Roorkee
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Comments

  1. बिलकुल सही विश्लेषण

    भूख से रोता बच्चा सो गया माँ की गोद में
    सरकारों के बदलने से कहा पेट भरते है

  2. गरीबी ,अशिक्षा,जातिवाद .धर्म ये सब अनमोल रत्न हैं इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ( कौन गरीबी अशिक्षा को खत्म करना चाहता है …अगर ये खत्म हो गए तो यह शोषणकारी व्यवस्था कैसे चलेगी ? आपने सही लिखा है .बधाई .

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