15 C
New Delhi
Sunday 17 November 2019
Views Articles हाशिये पर कश्मीरी पंडित

हाशिये पर कश्मीरी पंडित

-

- Advertisment -

Subscribe to our newsletter

You will get all our latest news and articles via email when you subscribe

The email despatches will be non-commercial in nature
Disputes, if any, subject to jurisdiction in New Delhi

दियों से कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों को 1990 में आतंकवाद की वजह से घाटी छोड़नी पड़ी या उन्हें जबरन निकाल दिया गया। कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बेरहमी से सताया गया। उनकी बेरहमी से हत्याएं की गई। उनकी स्त्रियों, बहनों और बेटियों के साथ दुष्कर्म किया गया। उनकी लड़कियों का जबरन निकाह मुस्लिम युवकों से कराया गया।

सरकारों की चुप्पी

यह अत्याचार कई वर्षो तक चला, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने कभी भी उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में रूचि नहीं दिखाई। आज भी ये जम्मू और दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में बदहाल अवस्था में रह रहे हैं, लेकिन सरकारें इनकी समस्याओं के समाधान के नाम पर चुप्पी साधे बैठी हैं।

पाकिस्तान का छद्म युद्ध

युद्ध में भारत का सामना न कर पाने वाले पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी में छद्म युद्ध छेड़ रखा है। पाकिस्तानी समर्थित आतंकियों द्वारा कश्मीर में बड़े पैमाने पर आतंकी वारदातें की गई। आतंकियों के निशाने पर कश्मीरी पंडित रहे, जिससे उन्हें अपनी पवित्र भूमि से बेदखल होना पड़ा और अब वे अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं। पिछले 23 वर्षो से जारी आतंकवाद ने घाटी के मूल निवासी कहे जाने वाले लाखों कश्मीरी पंडितों को निर्वासित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया है।

‘जेहाद’ और ‘निजामे-मुस्तफा’ के नाम पर बेघर किए गए लाखों कश्मीरी पंडितों के वापस लौटने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। ऐसे में जातिसंहार और निष्कासन के शिकार कश्मीरी पंडित घाटी में अपने लिए ‘होम लैंड’ की मांग कर रहे हैं।

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की गाथा

24 अक्टूबर, 1947 की बात है, पठान जातियों के कश्मीर पर आक्रमण को पाकिस्तान ने उकसाया, भड़काया और समर्थन दिया। तब तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद का आग्रह किया।

नेशनल कांफ्रेंस [नेकां], जो कश्मीर सबसे बड़ा लोकप्रिय संगठन था व उसके अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला थे, ने भी भारत से रक्षा की अपील की। पहले अलगाववादी संगठन ने कश्मीरी पंडितों से केंद्र सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए कहा था, लेकिन जब पंडितों ने ऐसा करने से इनकार दिया तो उनका संहार किया जाने लगा।

कश्मीरी पंडितों का पलायन

4 जनवरी 1990 को कश्मीर के प्रत्येक हिंदू घर पर एक नोट चिपकाया गया, जिस पर लिखा था- कश्मीर छोड़ के नहीं गए तो मारे जाओगे।

सबसे पहले हिंदू नेता एवं उच्च अधिकारी मारे गए। फिर हिंदुओं की स्त्रियों को उनके परिवार के सामने सामूहिक दुष्कर्म कर जिंदा जला दिया गया या निर्वस्त्र अवस्था में पेड़ से टांग दिया गया। बालकों को पीट-पीट कर मार डाला। यह मंजर देखकर कश्मीर से 3.5 लाख हिंदू पलायन कर गए।

संसद, सरकार, नेता, अधिकारी, लेखक, बुद्धिजीवी, समाजसेवी और पूरा देश सभी चुप थे। कश्मीरी पंडितों पर जुल्म होते रहे और समूचा राष्ट्र और हमारी राष्ट्रीय सेना देखती रही। आज इस बात को 23 साल गुजर गए।

भारत के विभाजन के तुरंत बाद ही कश्मीर पर पाकिस्तान ने कबाइलियों के साथ मिलकर आक्रमण कर दिया और बेरहमी से कई दिनों तक कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार किए गए, क्योंकि पंडित नेहरू ने सेना को आदेश देने में बहुत देर कर दी थी।

इस देरी के कारण जहां पकिस्तान ने कश्मीर के एक तिहाई भू-भाग पर कब्जा कर लिया, वहीं उसने कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम कर उसे पंडित विहीन कर दिया।

अब जो भाग रह गया वह अब भारत के जम्मू और कश्मीर प्रांत का एक खंड है और जो पाकिस्तान के कब्जे वाला है, उसे पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) या गुलाम कश्मीर कहा जाता है, जहां से कश्मीरी युवकों को धर्म के नाम पर भारत के खिलाफ भड़काकर कश्मीर में आतंकवाद फैलाया जाता है।

23 साल से गुलाम कश्मीर में कश्मीर और भारत के खिलाफ आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस आतंकवाद के चलते जो कश्मीरी पंडित गुलाम कश्मीर से भागकर इधर के कश्मीर में आए थे उन्हें इधर के कश्मीर से भी भागना पड़ा और आज वे जम्मू या दिल्ली में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं।

1947 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से भगाए गए कश्मीरी पंडित जम्मू में रहते हैं। उन्हें जम्मू में रहते हुए आज तक भारतीय नागरिकता नहीं मिली है।

1989 के पहले कभी कश्मीरी पंडित बहुसंख्यक हुआ करते थे, लेकिन आज ज्यादातर मुसलमान कश्मीरी पंडित हैं और जो नहीं है वह शरणार्थी शिविर में नारकीय जीवन काट रहे हैं।

भारत की आजादी ने उनसे उनका सब कुछ छीन लिया। 1989 के पहले भारतीय कश्मीर के पंडितों के पास अपनी जमीनें, घर, बगीचे, नावें आदि सभी कुछ था।

घाटी से पलायन करने वाले कश्मीरी पंडित जम्मू और देश के अन्य इलाकों में विभिन्न शिविरों में रहते हैं। 23 साल से वे वहां जीने को विवश हैं। कश्मीरी पंडितों की संख्या 4 लाख से 7 लाख के बीच मानी जाती है, जो भागने पर विवश हुए। एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई।

1947 में पाकिस्तान शासित कश्मीर से भगाए गए कश्मीरी पंडित जम्मू में रहते हैं। इसके बाद घाटी से भगाए गए पंडित भी जम्मू में रहते हैं लेकिन वहां भी उनका जीवन मुश्किलों से भरा हुआ है।

खोखले दावे

कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी के लिए विभिन्न केंद्रीय व राच्य सरकारें लगातार प्रयास करने का दावा करते हुए कई पैकेजों की घोषणा कर चुकी हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात है। विस्थापित कश्मीरी पंडितों के संगठन पनुन कश्मीर के नेता डॉ. अजय चरंगु का कहना है कि कश्मीरी पंडितों की कश्मीर की सियासत में कोई निर्णायक भूमिका नहीं रह गई है। हम लोगों को बडे़ ही सुनियोजित तरीके से हाशिये पर धकेला गया है।

कश्मीर से 1989 और 90 में लगभग पांच लाख कश्मीरी पंडितों का विस्थापन हुआ था। सरकार कहती है कि एक लाख से कम थे। सभी विस्थापित जम्मू, ऊधमपुर के विस्थापित शिविरों में रह रहे हैं। कई विस्थापित दिल्ली व देश के अन्य शहरों में शरण लिए हुए हैं। गांदरबल से भी कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ, लेकिन सरकार का दावा है कि पूरे गांदरबल जिले में कोई भी विस्थापित मतदाता नहीं है।

डॉ. चरंगु के अनुसार कश्मीरी पंडितों को वादी में बसाने लायक जिस माहौल की जरूरत है वह कोई तैयार नहीं कर रहा है। प्रधानमंत्री का कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए घोषित पैकेज भी सरकारी लालफीताशाही के फेर में ही फंसा हुआ है। बेरोजगारी और मुफलिसी के बीच जी रहे कश्मीरी पंडित पहले अपनी जान बचाएंगे या सियासी हक के लिए लड़ेंगे? एक अन्य कश्मीरी नेता चुन्नी लाल कौल के अनुसार सभी को कश्मीरियत का शब्द बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन हमारे लिए यह कोई मायने नहीं रखता।

पनुन कश्मीर

ये विस्थापित हिंदुओं का संगठन है। इसकी स्थापना सन् 1990 के दिसंबर माह में की गई थी। संगठन की मांग है कि कश्मीर के हिंदुओं के लिए घाटी में अलग राच्य का निर्माण किया जाए। पनुन कश्मीर का अर्थ है हमारे खुद का कश्मीर। वह कश्मीर जिसे हमने खो दिया है उसे फिर से हासिल करने के लिए संघर्ष करना। पनुन कश्मीर, कश्मीर का वह हिस्सा है, जहां घनीभूत रूप से कश्मीरी पंडित रहते थे। पनुन कश्मीरी यूथ संगठन एक अलगाववादी संगठन है, जो सात लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों के हक के लिए लड़ाई लड़ रहा है।

कौन है कश्मीरी पंडित

कश्मीरी हिंदुओं को कश्मीरी पंडित कहा जाता है और सभी ब्राह्माण माने जाते हैं। ज्यादातर कश्मीरी पंडित मांस खाते हैं और इनके मांसाहारी व्यंजनों में नेनी [बकरे के गोश्त का] कलिया, नेनी रोगन जोश, नेनी यखयिन [यखनी], मच्छ [मछली] आदि शामिल हैं। इनके शाकाहारी व्यंजनों में चमनी कलिया, वेथ चमन, दम ओलुव (आलू दम), राज्मा गोआग्जी, चोएक वंगन (बैंगन) आदि बेहद प्रसिद्ध हैं।

Leave a Reply

Opinion

Anil Ambani: From Status Of Tycoon To Insolvency

Study the career of Anil Ambani, and you will get a classic case of decisions you ought not take as a businessman and time you better utilise

तवलीन सिंह, यह कैसा स्वाभिमान?

‘जिस मोदी सरकार का पांच साल सपोर्ट किया उसी ने मेरे बेटे को देश निकाला दे दिया,’ तवलीन सिंह ने लिखा। क्या आपने किसी क़ीमत के बदले समर्थन किया?

Rafale: One Embarrassment, One Snub For Opposition

Supreme Court accepts Rahul Gandhi's apology for attributing to it his allegation, rejects the review petition challenging the Rafale verdict

Guru Nanak Jayanti: What First Sikh Guru Taught

While Guru Nanak urged people to 'nām japo, kirat karo, vand chhako', he stood for several values while he also fought various social evils

Muhammed Who Inconvenienced Muslims

Archaeologist KK Muhammed had earlier got on the nerves of the leftist intelligentsia for exposing their nexus with Islamic extremists
- Advertisement -

Elsewhere

Dalit worker in Punjab succumbs to barbaric attack

The attackers thrashed Jagmel Singh, a construction worker and Dalit, with rods, plucked his flesh with pliers and forced him to drink urine

Sabarimala reopens to find a jittery communist govt in Kerala

Kadakampally Surendran, Kerala Minister for Cooperation, Tourism and Devaswom, has made it clear Sabarimala is no place for a revolution

तवलीन सिंह, यह कैसा स्वाभिमान?

‘जिस मोदी सरकार का पांच साल सपोर्ट किया उसी ने मेरे बेटे को देश निकाला दे दिया,’ तवलीन सिंह ने लिखा। क्या आपने किसी क़ीमत के बदले समर्थन किया?

Telecom companies may get relief in payment of arrears

Vodafone-Idea and Airtel, which have more than 70 crore subscribers, have reported huge losses in the quarter ending September

Salaries to all on one fixed day of the month: Modi’s latest

The prime minister is overseeing the drafting of the bill to ensure private sector employers do not hold up salaries indefinitely or arbitrarily

You might also likeRELATED
Recommended to you

For fearless journalism

%d bloggers like this: