इन दिनों मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल या व्यापम में हुए घोटाले की चर्चा टीवी और अख़बारों पर ज़ोरों से चल रही है। कुछ दिन पहले तक ललित मोदी काण्ड की चर्चा थी जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी का नाम उभरते ही मानो मीडिया वालों को साँप सूंघ गया और उस विषय पर बहस अचानक समाप्त हो गई या कर दी गई। मध्य प्रदेश में इस कथित भ्रष्टाचार का मंचन आज नहीं हुआ; राज्य सरकार के इस विभाग में कई वर्षों से अयोग्य अभ्यर्थियों को दाख़िला मिलने का आरोप लगता रहा है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी का नाम लिया गया और राज्यपाल राम नरेश यादव भी संदेह के घेरे में हैं। राज्य के भूतपूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, उनके दफ़्तर के अफ़सर ओपी शुक्ल, खनन के व्यापारी सुधीर शर्मा, आईपीएस अधिकारी आरके शिवहरे, राजस्व विभाग के सह-आयुक्त रविकांत द्विवेदी आदि गिरफ़्तार हो चुके हैं। इसके अलावा घोटाले का आरोप जगदीश सागर, संजीव शिल्पकार एवं संजय गुप्ता जैसे डॉक्टरों पर लगा तथा सुधीर राय, संतोष गुप्ता, तरंग शर्मा के ‘गैंग’ को पुलिस ने क़ैद कर लिया है। व्यापम के परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी, अधिकारी सीके मिश्र, सिस्टम अॅनलिस्ट नितिन महेंद्र, ऑरोबिन्दो अस्पताल के जीएस खनूजा, छात्र मोहित चौधरी और जीतेन्द्र मालवीय, बिचौलिये नरेन्द्र देव आज़ाद व अनिमेष आकाश सिंह, डॉ विनोद भंडारी, इत्यादि इस मुआमले में सलाखों के पीछे हैं। गिरफ़्तारियों के इस सिलसिले को देखकर एक तरफ़ जहाँ राज्य सरकार की मुस्तैदी का आभास हो रहा है वहीं एक स्वाभाविक सा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जिस सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप है उसी की पुलिस गड़बड़ी की जाँच करके न्याय कैसे दिला सकती है। इतना अवश्य है कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय की निगरानी में स्पेशल टास्क फ़ोर्स काम कर रहा है, पर क़ानून का निर्धारण और उस का पालन दो पृथक विषय हैं।
विषय अत्यंत गंभीर तब हो गया जब एक के बाद एक इस मुआमले से जुड़े कई व्यक्तियों की मौत हो गई; औपचारिक आंकड़ों के हिसाब से अब तक व्यापम ने 25 जानें ले ली हैं जब कि अनौपचारिक आंकड़ा 40 से अधिक है। इनमें से कई ने सड़क दुर्घटना में, शराब के सेवन से या दिल की धड़कन रुक जाने के कारण अपनी जानें गँवाईं। लेकिन न तो इतने प्राणों का अकस्मात् अंत स्वाभाविक हो सकता है और न ही हार्ट अटैक से मरने वालों का दिल की बीमारी का इतिहास रहा है। सुलझे हुए लोग इन मौतों में दैविक या पैशाचिक हाथ देखेंगे नहीं और इसे जासूसी कहानी जैसा दिलचस्प बताना फूहड़पन होगा। चूँकि सीबीआई की निष्पक्षता पर भी विपक्ष और जनता को भरोसा नहीं है, सर्वोच्च न्यायालय के अधीन कार्यरत कोई विशेष जाँच दल ही इस गुत्थी को सभी के संतोष के अनुसार सुलझा सकता है।
पर इस घोटाले को मध्य प्रदेश-विशेष की समस्या या भारतीय जनता पार्टी का लक्षण न समझा जाए। भारत का पूरा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार का पुलिंदा है। पर यह भारतीय स्वभाव नहीं बल्कि दोषपूर्ण नीति का नतीजा है। इतनी भारी मात्रा में नौकरियों का सरकारी क्षेत्र में होना एवं गाँव तथा अल्प-विकसित व छोटे शहरों में इन नौकरियों के लिए लोगों में उन्माद इस विकार के लिए ज़िम्मेदार हैं। सरकारी नुक़सान देश का नुक़सान है और हर भारतीय की हानि है — ऐसी सोच सरकारी तंत्र में व्याप्त नहीं है। अतः सरकारी नियुक्ति में अगर मध्य प्रदेश में रिश्वत चलती है तो उत्तर प्रदेश में जाति-भेद। बिहार व बंगाल में इन नौकरियों की चाह में न जाने कितने लाखों छात्र कितने वर्ष बिना किसी निजी कंपनी में नौकरी के या स्वयं के व्यवसाय के ‘कम्पटीशन’ के नाम रसीद कर देते हैं और अपने बूढ़े माँ-बाप पर बोझ बने रहते हैं। फ़र्क़ इतना है कि इस भयावह तरीक़े से सिलसिलेवार मौतों की ख़बर पहली बार मध्य प्रदेश से आई है। इस समस्या का समाधान एक तो ई-गवर्नेंस में है — जहाँ परीक्षाफल से लेकर नियुक्ति के मापदंड पारदर्शिता के साथ सर्वजनविदित हों — और दूसरा सामाजिक शिक्षा में। बड़े पैमाने पर छोटे-बड़े उद्योग बसाना और साथ ही साथ प्रत्याशियों को यह बताना कि सरकारी क्षेत्र रोज़गार का एकमात्र या बेहतरीन साधन नहीं है अत्यंत आवश्यक हो गया है। पर फ़िलहाल व्यापम घोटाले की निष्पक्ष जाँच और इसके शिकार हुए जीवित लोगों एवं मृतकों को समुचित न्याय दिलाना समय की सबसे बड़ी मांग है।