Wednesday 25 May 2022
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व्यवस्था परिवर्तन के लिए गोविन्दाचार्य का आह्वान

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राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन अलग-अलग राजनैतिक दलों एवं प्रत्याशियों से उम्मीद बांधे उन सभी नागरिकों को बधाई देती है जिन्होंने लोकतंत्र के इस महापर्व में भाग लिया। यह जनता का लोकतंत्र में विश्वास तथा सकारत्मक परिवर्तन की आस दिखाता है।

जन सामान्य ने तो अपना कर्तव्य पूरा किया, अब बारी राजनैतिक जन सेवकों (अपने कार्य के लिए राज्य द्वारा पारिश्रमिक एवं सुविधा लेने वाले जन सेवक ही होते हैं) की है। 2014 का चुनाव प्रचार राजनैतिक दलों एवं प्रत्याशियों के नकारात्मक रवैये को दर्शाता है। पार्टियां नहीं बल्कि व्यक्ति चुनाव लड़े। विचारधारा एवं संगठन की जगह व्यक्तिवाद और परिवारवाद का बोलबाला रहा। नए एवं पुराने सभी राजनैतिक दलों ने विचारधारा तथा सामूहिक संगठनात्मक क्षमता की जगह व्यक्ति को महत्व दिया। सब ने यह साबित करने की कोशिश की कि मेरा नेता दूसरे से ज्यादा चमत्कारी है! आरोप-प्रत्यारोप का बोलबाला रहा। किसी भी दल ने जनता से जुड़े गंभीर विषयों पर न तो चर्चा करने का प्रयास किया न ही एक ठोस कार्यक्रम प्रस्तुत किया।

यह राजनैतिक दलों की लोकतंत्र के प्रति लापरवाही और जनता को वरगलाने की भावना दिखाता है। २०१४ का चुनाव प्रचार के एन गोविन्दाचार्य के कथन “विभिन्न राजनैतिक दल एक दूसरे पर गोल करने की वजाय दर्शक दीर्घा मैं बैठी जनता पर दनादन गोल दाग रहे हैंको पूरी तरह सही साबित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अलग-अलग नामों तथा चिह्नों के साथ विभिन्न राजनैतिक दल मूलतः स्वभाव, नीति एवं विचार में एक हैं और सिर्फ़ सत्ता सुख पाने के लिये एक दूसरे से झगड़ रहे हैं।

राजनेताओं ने ऐसे भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है मानो वे ही जनता के एक मात्र भाग्य विधाता हैं एवं जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिये उनपर पूरी तरह निर्भर है। अपनी बातों को सही साबित करने के लिये जब वे यह कहते हैं कि ‘मैने यह कार्य किया’ तो उनका सेवाभाव नहीं वरन उनका अहंकार टपकता है। वस्तुस्थिति यह है कि २०१४ आते-आते राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गयी है। भारतीय लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भों से जनता का विश्वास डगमगाने लगा है। देश में नेतृत्वहीनता की स्थित उत्प्न्न हो गयी है। जनता द्वारा चुना गया जनप्रतिनिधि नेता तो नहीं बन सका वरन अपने सेवक का दायित्व भी सही ढंग से नहीं निभा सका। इसका कारण जनता की निष्क्रियता एवम राजनैतिक व्यवस्था को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था का अभाव भी रहा।

गोविंदाचार्य के शब्दों में ऐसी स्थिति का समाधान फुटकर राजनीति से नहीं अपितु राजनैतिक दलीय दासता से ऊपर उठकर सामूहिक नेतृत्व एवं जन संघर्षो के द्वारा राजनैतिक दलों को जनाभिमुख व लोक कल्याणकारीकर हो सकता है। जब स्थापित नेतृत्व विफल एवं कर्तव्यविमुख हो जाए तो दर्शक दीर्घा में बैठी जनता से ही लोगों को निकलना होगा और अपने ऊपर किये जा रहे गोल को रोकना होगा। आरोप एवं आलोचना की जगह सामान्य जन कि भागीदारी को बढ़ाना होगा।

भारत को भारत के अनुसार चलाने की आवश्यकता है। संवाद, सहमति और सहकार तथा साहस, पहल तथा प्रयोग के माध्यम से सामूहिक नेतृत्व द्वारा व्यवस्था परिवर्तन की राह पर चला जा सकता है।

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन उन तमाम देशवासियों से आग्रह करती है जो वर्तमान व्यवस्था से खिन्न हैं तथा बिना किसी राजनैतिक सत्ता लिप्सा के व्य्वस्था परिवर्तन की राह पर चलना चाहते हैं कि वे राजनीति को नैतिक बनाने की भरसक कोशिश करें।

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Surajit Dasgupta
Surajit Dasgupta
Co-founder and Editor-in-Chief of Sirf News Surajit Dasgupta has been a science correspondent in The Statesman, senior editor in The Pioneer, special correspondent in Money Life, the first national affairs editor of Swarajya, executive editor of Hindusthan Samachar and desk head of MyNation

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