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Tuesday 19 November 2019
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जावड़ेकर — फ़िल्मी हस्तियों पर सरकार ने कोई केस दायर नहीं किया

नरेन्द्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ वामपंथी एवं अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में ये मंत्री अक्सर बचाव की मुद्रा में नज़र आते हैं

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देश भर में लिंचिंग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखने वाले 49 नामी-गिरामी हस्तियों के ख़िलाफ़ दायर मामलों पर वामपंथियों की आलोचना के जवाब में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शनिवार को कहा कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। “सरकार ने कोई मामला दर्ज नहीं किया है। एक व्यक्ति अदालत में गया जिसकी वजह से एक आदेश पारित हुआ है,” मंत्री ने कहा।

देशद्रोह, सार्वजनिक उपद्रव और शांति भंग करने के आरोप में शुक्रवार को बिहार पुलिस ने दो महीने पहले लिखे गए पत्र में मौजूद हस्ताक्षरों के आधार पर मामला दायर किया। श्याम बेनेगल, अदूर गोपालकृष्णन, रामचंद्र गुह, मणिरत्नम, शुभा मुद्गल, अपर्णा सेन, कोंकणा सेनशर्मा और अनुराग कश्यप के नाम एफ़आईआर में दर्ज हैं जिससे मामला बनाकर पुलिस ने मुज़फ़्फ़रपुर की अदालत में पेश किया।

23 जुलाई को लिखे गए पत्र में कहा गया था कि “मुस्लिम, दलित और अन्य अल्पसंख्यकों पर लगी पाबंदियाँ तुरंत समाप्त होनी चाहिए” और यह कि “जय श्री राम” का नारा अब एक “भड़काऊ war cry (युद्ध घष)” बन गया है। पत्र में कहा गया कि “असंतोष के बिना लोकतंत्र संभव नहीं है” और लोगों को असंतोष फैलाने के लिए “देशद्रोही” या “Urban Naxal (शहरी नक्सली)” के रूप में बदनाम नहीं किया जाना चाहिए।

इस बीच द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) के अध्यक्ष एमके स्टालिन ने मांग की है कि 49 बुद्धिजीवियों के विरुद्ध राजद्रोह का मुक़द्दमा वापस लिया जाए।

27 जुलाई को अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा ने मुज़फ़्फ़रपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज की थी कि इन प्रसिद्ध हस्तियों ने “देश की छवि को धूमिल करने” और “अलगाववादी प्रवृत्तियों का समर्थन करने” के अलावा “प्रधानमंत्री के प्रभावशाली कार्य  को कमज़ोर करने” की कोशिश की थी।

एफ़आईआर 2 अक्टूबर को आईपीसी की धारा 124 ए (देशद्रोह), 153 बी (राष्ट्रीय एकीकरण के लिए पूर्वाग्रही या धारणाएं, 160 (कमिट अफेयर), 290) (सार्वजनिक उपद्रव करना), और 504 (शांति भंग) के तहत दर्ज की गई थी।

चौबीस घंटे के अंदर-अंदर 60 अन्य सेलिब्रिटीज़ ने इस खुली चिट्ठी के जवाब में अपनी खुली चिट्ठी लिखी थी जिसमें शामिल थे कवि प्रसून जोशी, शास्त्रीय नृत्यांगना और सांसद सोनल मानसिंह, मोहन वीणा के आविष्कारक पंडित विश्व मोहन भट्ट, फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर और विवेक अग्निहोत्री।

नरेन्द्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ वामपंथी एवं अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में जावड़ेकर अक्सर बचाव की मुद्रा में नज़र आते हैं और लगभग आरोप लगाने वालों की विचारधारा से सहमत होते हुए प्रतीत होते हैं। इससे पहले सिर्फ़ न्यूज़ ने ख़बरों का एक सिलसिला चलाया था जहाँ अकालियों ने दयाल सिंह कॉलेज को हड़पने की कोशिश की थी और मामला संसद में उठाया था यह बताते हुए कि ब्रह्म समाज के दयाल सिंह दरअस्ल सिक्ख थे और इसलिए उनके नाम से चल रहे कॉलेज पर सिक्खों का अधिकार होना चाहिए जब कि दयाल सिंह ट्रस्ट द्वारा कॉलेज न चला पाने की स्थिति में दशकों पहले यह दिल्ली विश्वविद्यालय को हस्तांतरित हो चुका था। उस मामले में भी जावड़ेकर ने मिथ्या आरोप को मानते हुए कॉलेज के नामकरण के विरुद्ध अपनी राय सुनाई थी।

जिन ख़बरों की देश भर में चर्चा हुई उनमें एक है जावड़ेकर का यह कहना कि मोदी के राज में वामपंथियों द्वारा लिखी किताबों में एक comma (अल्पविराम) भी नहीं बदला गया

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