चुनाव प्रचार में जातिवाद और बाहरी कार्यकर्ताओं के उपयोग की निंदा करता है गोविन्दाचार्य का संगठन

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राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन (रा०स्वा०आ०) की दिल्ली इकाई ने वर्ष २०१४ के चुनाव में अपनी भूमिका की समीक्षा के लिये हाल ही में एक बैठक बुलाई थी।  बैठक में भाग लेने वाले सदस्यों ने लोकसभा चुनाव में बाहरी कार्यकर्ताओं के जमावड़े एवं राजनैतिक लाभ के लिए राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों द्वारा अपनी-अपनी जाति को भुनाने की कोशिश की निन्दा की।

इस चुनाव में सिर्फ़ क्षेत्रीय दल ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय दलों एवं उनके प्रत्याशियों ने खुलकर राजनैतिक फ़ायदे के लिये जाति का कार्ड खेलने की कोशिश की है जो एक स्वस्थ लोकतन्त्र के लिये ख़तरनाक क़दम है।  रा०स्वा०आ० के सदस्यों के अनुसार यह आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन एवम एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये घातक है।

ऐसा भी पाया गया है कि कुछ चुनाव क्षेत्रों में विभिन्न राजनैतिक दलों ने चुनाव प्रचार के नाम पर बाहर के कार्यकर्ताओं को भेजा है।  बाहर से आए कार्यकर्ताओं के कारण उस चुनावी क्षेत्र के स्थानीय मुद्दे गौण हो जाते हैं। स्थानीय निवासियों के सामान्य दिनचर्या में उथल-पुथल आ जाती है तथा स्थानीय लोगों की चुनाव मैं भागीदारी बाह्य लोगों से प्रभावित होती है। बाहरी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा यह भी साबित करता है कि स्थानीय लोगों की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी कम की गयी।

ऐसा कार्य स्थानीय नेतृत्व को विकसित होने में भी बाधक है तथा चुनाव गंभीर विषय न रह कर मनोरन्जन का विषय बन जाता है। वर्तमान परिस्थितयों को देखते हुए रा०स्वा०आ०चुनाव आयोग से निम्नलिखित मांग करती है:

  1. किसी चुनाव क्षेत्र में विभिन्न राजनैतिक दलों के बाहरी कार्यकर्ताओं की एक संख्या निर्धारित हो।
  2. चुनाव प्रचार ख़त्म होते ही इन कार्यकर्ताओं को उस क्षेत्र से बाहर किया जाए।
  3. चुनाव के दौरान बिना अनुमति के किसी बाहरी कार्यकर्ता को नहीं रहने दिया जाए।
  4. बाहर से आये कार्यकर्ताओं के रहने एवं यात्रा के ख़र्च को प्रत्याशी के चुनावी ख़र्च में जोड़ा जाए।
  5. चुनाव आयोग जातिगत राजनिति करने वाले दल एवं प्रत्याशियों के बयान का संज्ञान लेते हुए उचित कार्यवाही करे।

रा०स्वा०आ० उपर्युक्त विषय को चुनाव सुधार के लिये आवश्यक मानती है और देश के सामान्य नागरिक, राजनैतिक दल एवम प्रबुद्ध लोगों की राय इस विषय में मांगती है।