Wednesday 25 May 2022
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केजरीवाल से हुई तौहीन-ए-अदालत की पैरवी कर रहे हैं गोविन्दाचार्य

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म आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल की अदालत की जानबूझ कर अवमानना की जिस करतूत को मीडिया ने “नौटंकी” क़रार दिया है, उस करनी के समर्थन में खड़ा हो गया है के एन गोविन्दाचार्य का संगठन।

अभी मिले राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के प्रेस नोट में यह सवाल उठाया गया है — “क्या राजनैतिक लड़ाई अब न्यायालय के माध्यम से लड़ा जाएगा? राजनीतिज्ञ A राजनीतिज्ञ B पर भ्रस्टाचार का आरोप लगाते हैं। आरोप का असर ऐसा होता है कि राजनीतिज्ञ B को अपना पद भी छोड़ना पड़ता है। आरोपित राजनीतिज्ञ इस आरोप का जबाब राजनैतिक रूप से देने के बजाय मानहानि मुक़द्दमे के रूप में न्यायालय का मार्ग अपनाते हैं। न्यायालय में A अपने आरोप पर खड़े होते हैं। अदालत उन्हें जमानत मुचलका देने के लिए कहता है और वे सैद्धांतिक रूप से इसे लेने से मना करते हैं। अदालत उहें न्यायिक हिरासत में भेज देती है।”

रा०स्वा०आ० के नोट में इस बात पर कोई सफ़ाई नहीं दी गई कि उसी कथित आन्दोलन के सिलसिले में जब योगेन्द्र यादव जैसे अन्य आ०आ०पा० के नेताओं ने मुचलका भरने से इनकार नहीं किया तब उनके सिद्धांत का क्या हुआ?

गोविन्दाचार्य के संगठन का कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में घटी यह घटना कई अनुत्तरित प्रश्नों को जन्म देती है—

“१। क्या अगर कोई सामान्य आदमी सत्ता या राजनीति के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के ऊपर उनकी अक्षमता या भ्रष्टाचार का आरोप लगाता है तो उसे मानहानी के मुक़द्दमे का सामना करना पड़ेगा?
२। क्या इस आरोप की जाँच हो गयी?
३। क्या आरोप लगाने वाले के लिए ज़मानती मुचलका भरना अनिवार्य है?
४। क्या आरोप लगानेवाला व्यक्ति ग़रीब हो तो उसे न्याय के अधिकार से वंचित होना होगा?
५। क्या अदालतें अब इस देश के भाग्य का फैसला करेगी? क्या अदालत सर्वोच्च है?
६। क्या राजनीतिज्ञ अपनी लड़ाई को न्यायालय के माध्यम से निबटारा करेंगे?

तीसरे सवाल से अज्ञान झलकता है। दरअस्ल मुचलका में पैसे नहीं भरने होते, बल्कि अदालत में सम्मन के अनुसार हाज़िर न होने की सूरत में दोषी से बताई गई रक़म वसूली जाती है। अतः अगर कोई ग़रीब हो पर उसके मन में न्यायलय की अवमानना करने की कोई दुरभिसंधि न हो तो उसकी ग़रीबी न्याय में बाधक नहीं बनती।

गोविन्दाचार्य का संगठन इस सिलसिले में याद करता है कि “तक़रीबन २० वर्ष पहले एल० के० आडवाणी के ऊपर एक ग़लत आरोप लगाया गया था।उन्होंने आरोप लगते ही अपने पद को छोड़ा एवं यह कहा कि जब तक उनका नाम इस सूची से नहीं हटेगा वो देश की संसद में नहीं आयेंगे। उनके नैतिक साहस  को देश ने सराहा। वे लोकप्रिय नेता बने।जाँच प्रक्रिया में बेदाग़ साबित हुए। क्या वर्तमानराजनीतिज्ञों में उस नैतिक साहस का अभाव हो गया है?

यहाँ दो प्रश्न उठते हैं। पहला, भले ही आडवाणी उस मुआमले से बाइज्ज़त बरी हो गए थे, दिवंगत व भूतपूर्व सी०बी०आइ० के संयुक्त निदेशक बी० आर० लाल ने अपनी पुस्तक “हू ओन्स द सी०बी०आइ०” में लिखा कि राम जन्मभूमि आन्दोलन के समय भारतीय जनता पार्टी के पास हवाला के अलावा और कोई ऐसा उपाय नहीं था जिससे विश्व हिन्दू परिषद् से आन्दोलन के लिए ज़रूरी पैसे लिए जा सके। इसलिए आडवाणी ने हवाले के ज़रिये पैसे मंगवाए। पर इसे अदालत में साबित करना संभव न था, सो आडवाणी बरी हो गए!

दूसरा, चाहे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू०पी०ए० सरकार हो या भाजपा के कुछ गिने-चुने नेता, उनके ख़िलाफ़ लगे अनगिनत आरोपों के चलते ख़ास कर युवा समाज में इतने आक्रोश का जन्म हुआ कि अण्णा हज़ारे के आह्वान पर लोग जन लोकपाल आन्दोलन में कूद पड़े। फिर उस आन्दोलन से जिस पार्टी का जन्म हुआ वह आ०आ०पा० आज हर प्रतिद्वंद्वी पर बेबुनियाद और अनर्गल आरोप लगाने के लिए बदनाम हो गया है। उसके इस व्यवहार से समाज का पढ़ा-लिखा तब्का पार्टी से मुँह मोड़ रहा है।

ऐसे में व्यवस्था परिवर्तन की मशाल जलाने वाले गोविन्दाचार्य को क्या इस बात पर ज़ोर नहीं देना चाहिए कि आइन्दा राजनीति में कोई अगर किसी पर आरोप लगाए तो पूरी ज़िम्मेदारी के साथ लगाए, जब उसे इस बात पर यक़ीन हो कि वह उस आरोप को अदालत में सिद्ध कर सकता है?

इसके आगे रा०स्वा०आ० का कहना है, “इस देश के एक लोकप्रिय राजा की रानी पर एक सामान्य जन ने ग़लत टिप्पणी की। इसकी जानकारी राजा और रानी को हुई।उन्होंने उस नागरिक को दण्डित करने के बजाय रानी को जंगल में भेजा एवं ख़ुद राजमहल में जंगल सा कष्टमय जीवन व्यतीत करने लगे।जनता को अपने गलती का अहसास हुआ और अपने कृत्यों के लिय राजा से क्षमा माँगी। राम राज्य की इस जनप्रिय नीति के कारण उसे आदर्श राज्य मना जाता है। क्या राम राज्य की बात करने वाली पार्टी इन नीतियों एवं आदर्शों को भूल गयी। या कथनी और करनी में अंतर है?

यह बात अपनी जगह सही लगती है हालांकि नारीवादी यह मानते हैं कि राजा राम एक आदर्श पति की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। धर्म के विशेषज्ञों का मानना है कि श्रीराम की जगह यदि श्रीकृष्ण होते तो आरोप लगाने वाले धोबी के साथ बहस करते और उसे समझाते कि वह किन कारणों से ग़लत सोच रहा है। और सही तर्क पेश करने में श्रीकृष्ण को यह महारत हासिल थी कि वे इस वितर्क से विजयी होकर ही बाहर निकलते।

इस ज़माने की बात पर आयें तो जिस दौर में गडकरी पर आरोपों की बमबारी हो रही थी उस दौर में भाजपा के नेताओं का कहना था कि अगर आरोप लगने पर ही किसी नेता को इस्तीफ़ा देना पड़े तो देश से राजनीति का पेशा ही समाप्त हो जाएगा क्योंकि किसी भी प्रतिद्वंद्वी पर आरोप लगाने जैसा आसान काम और कोई नहीं। इस प्रकार तो राजनीति का मैदान चटियल मैदान में परिवर्तित हो जाएगा। आ०आ०पा० के ख़िलाफ़ भी अब तक कई आरोप लग चुके हैं — “सम्पूर्ण परिवर्तन” नामक एन०जी०ओ० में घोटाले के बाद उसे “परिवर्तन” के नाम से चलाना, चुनावी शपथपत्र में संपत्ति का ग़लत ब्यौरा देना, भारतीय राज व्यवस्था नामक पुस्तक से कई अनुच्छेद चुराकर स्वराज पुस्तक लिखना, मनीष सिसोदिया द्वारा एन०जी०ओ० “कबीर” के पंजीकरण से पहले सरकार से साँठ-गाँठ करके विदेशी अनुदान हासिल करना, उस एन०जी०ओ० के पैसों से अपने मकान का किराया और अपनी पत्नी को वेतन देना, मयंक गाँधी और अंजलि दमानिया पर घोटालों के आरोप इत्यादि!

रा०स्वा०आ० के प्रेस नोट के अंत में लिखा है कि “अरविन्द केजरीवाल का मानहानी के मुक़द्दमे में न्यायिक प्रक्रिया की शुरुआत से पहले हिरासत में लिया जाना कई प्रश्नों को जन्म देती है। हम आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं।” सिर्फ़ News ने अपनी प्रतिक्रिया दे दी है। अब गोविन्दाचार्य की तरफ़ से इस प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया आए, इसका इन्तज़ार है।

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Surajit Dasgupta
Surajit Dasgupta
Co-founder and Editor-in-Chief of Sirf News Surajit Dasgupta has been a science correspondent in The Statesman, senior editor in The Pioneer, special correspondent in Money Life, the first national affairs editor of Swarajya, executive editor of Hindusthan Samachar and desk head of MyNation

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