आसाराम की सज़ा हिन्दुओं के लिए सीख

समाज के किसी भी अंश को किसी भी प्रकार ऐसे दुष्टों के बचाव में नहीं खड़ा होना चाहिए; पर अदालत की कार्यवाही के पश्चात् हर बार शहर के शहर कर्फ्यू-नुमा हालत से गुज़रते हैं; अतः यह समझना ज़रूरी है कि समाज के एक अंश के इस उन्माद व्यवहार के पीछे कैसी मानसिकता काम करती है

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एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने के अपराध में ‘आसाराम बापू’ उर्फ़ आसुमल थाउमल हरपलानी को जोधपुर अनुसूचित जाति व अनुसूचित उपजाति न्यायलय ने उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी है। यौन शोषण का एक और मुआमला अभी शेष है। यह पहला दृष्टान्त नहीं है जब किसी ‘बाबा’ को किसी अपराध के लिए दोषी पाया गया और उसे सज़ा सुनाई गई। गुरमीत राम सहीम इंसान का प्रकरण अभी जनमानस की स्मृति में ताज़ा है। इससे पहले कभी तुच्छ सांसारिक संपत्ति के झगड़े में, कभी नाजायज़ रिश्तों के कारण, कभी बाबाओं के बीच आपसी रंजिश के मुआमलों में ये कथित साधू क़ानून के शिकंजे में फँसते रहे हैं। आसाराम के मुआमले में पीड़िता उन्हीं के छिन्दवाड़ा-स्थित आश्रम की एक छात्रा थी जो कि उत्तर प्रदेश के शाहजहानपुर से वहाँ पढने आई थी। जोधपुर के मनाई क्षेत्र में उसे बुलवाकर आसाराम ने उसका बलात्कार किया — यह आरोप अब सिद्ध हो चुका है। अपने गुरु के हाथों इस तरह प्रताड़ित होने से अधिक लज्जाजनक, निंदनीय और जघन्य बात और क्या हो सकती है? उस किशोरी के लिए और समूचे हिन्दू समाज के लिए भी। समाज के किसी भी अंश को किसी भी प्रकार ऐसे दुष्टों के बचाव में नहीं खड़ा होना चाहिए। पर अदालत की कार्यवाही के पश्चात् हर बार शहर के शहर कर्फ्यू-नुमा हालत से गुज़रते है — चाहे दोषी क़रार दिए गए बाबा के अनुयायियों के उत्पात के कारण या उनकी हिंसा से बचने के लिए किए गए पुलिसिया इंतज़ामात की वजह से। अतः यह समझना ज़रूरी है कि समाज के एक अंश के इस उन्माद व्यवहार के पीछे कैसी मानसिकता काम करती है।

आसाराम, गुरमीत, रामपाल और कई कथित बाबा या तो ऐसे क्षेत्र में काम करते हैं जो सरकारों द्वारा उपेक्षित हो या उस वर्ग के लिए काम करते हैं जो मुख्यधारा के समाज द्वारा तिरस्कृत हो। आसाराम उसी क्षेत्र में सक्रिय थे जहाँ भारी मात्रा में हिन्दुओं को ईसाई बनाने के लिए वर्गलाया जा रहा था। पंजाब और हरियाणा के डेरे ऐसे लोगों को आश्रय प्रदान करते हैं जिन्हें जाट सिक्ख गुरुद्वारों में प्रवेश की अनुमति नहीं देते। यह भी मज़हब परिवर्तन के मुद्दे से जुड़ा हुआ है क्योंकि यदि इन लोगों को कहीं भी आश्रय नहीं दिया गया तो इनका मुसलमान या ईसाई बन जाना निश्चित है। पर यदि यही आशंका हिन्दू समाज को विचलित करती है तो क्या सुशिक्षित, ज़िम्मेदार, धार्मिक, सत्यवादी लोगों या संस्थाओं को यह काम नहीं सौंपी जा सकती? इसमें एक समस्या यह है कि ग़ैर-सरकारी संस्थाओं में भी भ्रष्टाचार व्याप्त और व्यापक है। एन जी ओ के ध्वजधारियों के कलेवर देखकर भले ही कोई शहरी मूर्छित हो जाए, प्रायशः उपहास के पात्र की तरह दर्शाए जाने वाले गाँव वासी इनपर भरोसा नहीं कर पाते। अतः रामकृष्ण मिशन, शंकराचार्य, चिन्मय मिशन आदि सम्मानित संस्थाओं को अपनी समाज सेवा का दायरा बढ़ाकर हिन्दू समाज के अनधिकृत वर्गों के लिए काम करना होगा। निजी क्षेत्र की जो कम्पनियाँ लोकहितैषी कार्य में विश्वास रखती हैं, उनके साथ विचार-विमर्श कर ऐसे व्यवसाय के मॉडल विकसित करने होंगे जिससे कि ग़रीबों को रोज़गार मिले, उनका आत्मसम्मान और हौसला बढ़े पर पैसों के अभाव में समाजसेवा ठप्प न हो जाए। वाक़ई कई ऐसे संस्थान हैं जो ऐसा काम कर रहे हैं। उनके विस्तार की ज़रूरत है।

हिन्दुओं को यह समझना होगा कि आए दिन गिरफ़्त में आने वाले ये तथाकथित बाबा और स्वामी आधारभूत रूप से कभी साधू थे ही नहीं; चारित्रिक दृष्टिकोण से देखें तो इन्होंने कभी मोह-माया त्यागा ही नहीं; ईश्वर से संपर्क स्थापित करना तो दूर की बात है। परन्तु समाज में गुरुकुल के पतन के कारण और परिवारों में ग्रंथों की शिक्षा के ह्रास के कारण अधिकांश पारंपरिक पर दिशाहीन हिन्दू गुरु की तलाश में भटकते-भटकते पाखंडियों के चंगुल में जा फँसे। यहाँ अक्सर उनका मानसिक के साथ-साथ शारीरिक शोषण भी होता है। और ये शिष्य इस हद तक सम्मोहन की स्थिति में रहते हैं कि इन्हें अपने शोषण में भी कई बार उद्धार होने का गुमान होता है। यदि ईश्वर-परायण हिन्दू वेदों, उपनिषदों, पुराणों का पाठ स्वयं करे, संस्कृत की समझ न हो तो अनुवाद का सहारा ले तो किसी और से जीवन के गूढ़ समझने की आवश्यकता ही न पड़े; श्रीकृष्ण भगवान् के रूप में श्रीमद्भगवद्गीता में जो पाठ पढ़ा गए हैं, उसके आगे कोई क्षुद्र मानव किसी को क्या राह दिखायेगा? और जो हिन्दू नास्तिक हैं वो तो इन बाबाओं के झांसे में आते ही नहीं हैं। उनमें से कई कम्युनिस्ट विचारधारा में दीक्षित होकर देशहित के ख़िलाफ़ काम करने लगते हैं, यह और बात है। कम से कम उस ख़ेमे में शोषण नहीं होता; व्यभिचार भले ही हो।

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