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आमिर ख़ान का दोगला चरित्र

Editorials

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Bikram Upadhyay
संपादक, स्वराज पत्रिका

In India

आमिर ख़ान की फिल्म दंगल जबर्दस्त सफलता की ओर जा रही है। नोटबंदी के कारण नकदी के टोटे होने के बावजूद उसी भारत ने फिल्म दंगल के लिए दो दिन के अंदर ही 100 करोड़ से अधिक दे दिए जिस भारत को लेकर आमिर ने पिछले साल ही कहा था — उन्हें यहां अब डर लगता है। उनकी पत्नी भारत से कहीं और जाकर रहना चाहती है क्योंकि यहां इतनी असहिष्णुता बढ़ गई है वे अब यहां सुरक्षित महसूस नहीं करते। दंगल की सफलता के बाद आमिर ख़ान से पूछा जाना चाहिए था कि भारत के लोग असहिष्णु हैं या वे ख़ुद जो जनता की जेब में निकाल कर अपना घर भरते हैं और फिर उसी जनता को जाहिल-जंगली तक कह देते हैं।

लोग यह कहेंगे कि आमिर कलाकार है और उस समय “असहिष्णु भारत” वाली उनकी टिप्पणी भावनाओं में बहकर बाहर आ गई थी। बाद में उन्होंने यह कहा भी था कि वह भारत में जन्में हैं और यहीं दफन भी होना चाहते हैं। बेशक आमिर कलाकार होने के कारण भावुक हो सकते हैं — पर जो भी टिप्पणी उन्होंने भारत की असहिष्णुता को लेकर की थी, उसके लिए आज तक उन्होंने कोई खेद प्रकट नहीं किया है। देश में उनकी टिप्पणी को लेकर जिस तरह का ग़ुस्से और कड़वाहट का ज्वार भड़का था उसे शांत करने के लिए आमिर ने किसी से भी माफी नहीं मांगी। उल्टे उन्होंने कहा था — “I stand by everything I have said (मैं अपने कहे पर कायम हूं)।” आमिर ने अपनी टिप्पणी पर विरोध करने वाले को फटकारते हुए यह भी कहा था—“To all the people shouting obscenities at me for speaking my heart out, it saddens me to say you are only proving my point (वे सब लोग जो मुझ पर दिल की बात कहने पर जिस तरह से चिल्ला रहे हैं वे मेरे नजरिए को ही सही ठहरा रहे हैं)।” उसी आमिर को ये ‘चिल्लाने वाले लोग’ कंधे पर बिठाकर अपनी जेब से गुजारते हुए शीर्ष पर पहुंचा रहे हैं। यह है the most tolerant country in the world!

ख़ान वर्चस्व वाले बालीवूड में आमिर ख़ान ऐसे नाम हैं जो वक्त के साथ बदलने की महारत हासिल रखते हैं। ज़रूरत के हिसाब से दोस्ती या ज़रूरत के हिसाब से दुश्मनी। आमिर को दोनों आता है, इसलिए लोग उन्हें opportunist यानी अवसरवादी कहते हैं। आमिर की एक और ख़ूबी है कि वे माहौल को अपने पक्ष में करने का पैंतरा भी जानते हैं। अपने फ़ायदे के लिए वे किसी का भी नुक़सान कर सकते हैं। आमिर ने सलमान ख़ान का भी नुक़सान करने की उस समय कोशिश की जब पिछले साल एक पार्टी में दोनों साथ थे और बात हो रही थी दंगल और सुल्तान की। दोनों फिल्मों का विषय लगभग एक है; दोनों के कथानक भी एक दूसरे से मिलते हैं। पर उस पार्टी में आमिर ने सरेआम सलमान ख़ान का मज़ाक़ उड़ाया और यह कहा कि सलमान ने तो इस फिल्म पर मेहनत ही नहीं की है; जैसे तैसे फिल्म बनाकर दर्शकों पर थोप दिया है! पार्टी में अपनी इस तरह की बेइज़्ज़ती सलमान बर्दाश्त नहीं कर सके और वहीं उन दोनों की लड़ाई भी हो गई। बाद में दंगल के रिलीज़ होने पर सलमान ने खुले आम कहा कि आमिर उनके लिए दुश्मन है। लेकिन आमिर को इससे फर्क नहीं पड़ा और फिल्म को लगातार कामयाबी मिलती जा रही है।

आमिर ख़ान को कुछ लोगों ने Mr Perfectionist क्या कह दिया कि उन्हें अब लगता है कि वो जो भी कह या कर रहे हैं, उसमें गलती या नुक्स निकालने की ज़रूरत ही नहीं है। और फिर इसकी आड़ में लोगों की भावनाओं से खेलते जा रहे हैं। बात सिर्फ़ फ़िल्म की ही नहीं निजी जिंदगी में भी वैसे ही दोहरे चरित्र में आमिर जी रहे हैं। सलमान ने तो उन्हें उनकी इस आदत के लिए फ़र्ज़ी तक कह दिया।

आमिरआमिर ने एक बार जनता के मंच से कहा था कि सामाजिक सरोकार के मुद्दे पर बनने वाले किसी भी कार्यक्रम या विज्ञापन का वे एक पैसा नहीं लेते। लेकिन सबको पता है कि विभिन्न सामाजिक बुराइयों पर बने धारावाहिक के लिए आमिर ने न सिर्फ़ करोड़ों लिए, बल्कि जिस बलात्कार की घटना के लिए उन्होंने स्क्रीन पर आंसू बहाए उसके लिए उन्होंने दो घंटे का rehearsal भी किया। आमिर के कहने पर इस reality show को music, light और action के ज़रिये घटनाओं का cocktail बना दिया। जहां दर्शकों की भावनाओं से ख़ूब खेला गया। सच्ची घटनाओं को बढ़ा चढ़ाकर या चटकारा बना कर पेश किया गया। तब Mr Perfectionist नैतिकता के लिए नहीं show को hit कराने के लिए काम कर रहे थे।

आमिर का दावा होता है कि उनकी फ़िल्में message carry करती हैं। यानी दर्शकों के लिए कुछ संदेश ज़रूर होता है। पीके में दावा किया गया कि भगवान या ईश्वर के बिचौलियों को expose किया गया है, जबकि सबसे अधिक हिन्दू देवी देवताओं का मज़ाक़ उड़ाया गया। थ्री इडियेट्स के ज़रिये आमिर ने यह संदेश दिया कि अभिभावकों को अपने सपने अपने बच्चों पर नहीं थोपना चाहिए और उन्हें अपनी मनमर्ज़ी का कैरियर चुनने देना चाहिए। लेकिन आमिर दंगल में ठीक इसके उल्टे संदेश दे रहे हैं। फिल्म में वह यह बताते हैं कि लोग आज भी बेटियों को जन्म देना नहीं चाहते। जन्म देने के बाद उसे अपने हिसाब से चलते को कहते हैं। अपने पसंद के हिसाब से पेशेवर बनाना चाहते हैं। वह जानने की कोशिश भी नहीं करते कि आखिर बेटियां क्या चाहती है और बेटिया बेचारी अपने बाप के सपने को हक़ीक़त में बदलने के लिए वह सब कुछ करती है जो उन्हें नापसंद भी होता है।

सच कहें तो आमिर अपनी इमेज और अपनी सोच फ़िल्मों के ज़रिये लोगों की जेबों तक रखने में यक़ीन रखते हैं। दो साल में एक फिल्म और उस फिल्म के माध्यम से करोड़ों की कमाई उनकी रणनीति हो सकती है, आदर्श नहीं। एक आदर्श फ़िल्मी हस्ती बनने का भले ही वह दिखावा करें लेकिन हक़ीक़त तो यही है कि खुद को बुलंद करने के रास्ते में जो भी आए उससे निपटो। चाहे वह आदर्श हो या दोस्त।

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