Wednesday 27 October 2021
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‘आप’ नेशनल काउंसिल में सत्य और न्याय की हत्या

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शकील अहमद

केवल सत्य और मात्र सत्य ही आप सभी के सामने रख रहा हूँ। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को कैसे पार्टी से बाहर किया गया, यह कूट रचना कैसे रची गई, 28 मार्च को राष्ट्रीय परिषद् में दरअस्ल क्या और कैसे हुआ? यह सत्य आप तक पहुँचे तभी आप सही निर्णय पर पहुँच सकते है। यह बहुत गंभीर मामला इसलिए भी है क्योंकि पार्टी हम सभी ने अपनी बेशक़ीमती ज़िन्दगी के 4 साल देकर, लाखों रुपयों का व्यक्तिगत नुक़सान करके बनाई। दिन रात ख़ून-पसीना बहा कर हम ने यह पार्टी क्यों बनाई और क्या वे उद्देश्य अपनी पार्टी में अब हासिल हो सकेंगे? क्या हम अपने सपनों और आदर्शो का भारत बना सकेंगे? क्या हम सही रास्ते पर हैं या भटक चुके हैं? आइयह ज़रा 28 मार्च को सत्य और न्याय की हत्या कैसे हुई, हथियार कैसे बनाया गया और हत्या कैसे हुई — इसका अवलोकन करें।

दरअस्ल पूरी योजना के बीज लोक सभा चुनाव 2014 के पहले ही बोयह गए थे। पार्टी में एक पावर पॉलिटिक्स के माहिर खिलाड़ी ने योगेन्द्र यादव में एक प्रबल प्रतिद्वंदी देख लिया था जो आगे चल कर पार्टी में अपना क़द बहुत बढ़ा लेने की संभावनाओं से भरपूर थे। अतः एक कूट रचना के बीज तभी से बोने चालू कर दिए गए थे। ताना बाना और दम घोंट कर मारने का फंदा तभी से ही तैयार किया जा रहा था।

याद कीजियह कि जन लोकपाल आंदोलन में समाज की सभी शक्तियों ने एवम् बहुत से बुद्धिजीवियों और हस्तियों ने योगदान दिया था। परंतु आंदोलन से पार्टी बनाना योजना का हिस्सा था। लेकिन इसे ऎसे सजाया गया कि यह एक मात्र रास्ता दिखे। पार्टी बनाते वक़्त विभिन्न हस्तियों को पार्टी में आने से रोक दिया गया। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों की सभी शक्तियों के इकठ्ठा होने से पार्टी को जन लोकपाल — जो कि एक केंद्र सरकार का विषय है — में द्रुतगामी फायदा होता। इसके उलट पार्टी में कुछ लोंगों का ही क़ब्ज़ा रहे ऐसी योजना के तहत एक ऐसी कार्यकारिणी बनाई गई जिसका स्वरुप वास्तविकता में बहुत सीमित है। ध्यान से समझें तो केंद्र सरकार में केवल मंत्रालयों के लिए ही बहुत ज़्यादा लोगों की ज़रूरत रहती है। यह प्रसंग लाना इसलिए महत्वपूर्ण है कि हम इरादे पढ़े बिना केवल नारेबाज़ी के ज़रिए ही मामले को साफ़-साफ़ नहीं देख सकते हैं। जन लोकपाल बिल, न्यायिक सुधार, चुनाव क़ानूनों और नियमों में सुधार, नौकरशाही में सुधार इत्यादि तो केंद्र के विषय हैं।

ख़ैर, अब आते हैं 28 मार्च — हत्या के दिन और उसकी तैयारियों — पर। जो कुछ भी लीक वग़ैरह किए गए वो सब रचना का ही हिस्सा हैं जिसकी तैयारी 2014 लोक सभा चुनाव से पहले से ही चलती आ रही थी। फिर अरविन्द केजरीवाल का बैंगलोर चले जाना 10 दिन के लिए और वापस आ कर भी चुप्पी साधे रहना, प्रशांत के एस०एम्०एस का जवाब न देना इत्यादि भी पूर्वनियोजित योजना का ही क्रियान्वयन था।

संयोजक और मुख्यमंत्री दोनों एक साथ बने रहने की योजना के तहत ही एक बड़े शहर के आकार के राज्य में केजरीवाल ने कोई भी मंत्रालय अपने पास नहीं रखा। यह चौकाने वाला नहीं, समझने वाला फ़ैसला था। पार्टी में सिद्धांतो और लोकतंत्र तथा लूटतंत्र रिफ़ॉर्म्स के प्रति निष्ठावान विचारक नेताओं का सफ़ाया परंपरागत राजनीति और क्रन्तिकारी राजनीति के बीच दूरी को क्रमशः बढ़ाने की ओर एक और क़दम के रूप में भी देखा जाना चाहिए। अब केजरीवाल का पार्टी में वर्चस्व मायावती की बसपा या ठाकरे की शिव सेना के समकक्ष हो गया है। लोकपाल की छुट्टी के भी 2 उद्देश्य हैं। पहला कि परिषद् की बैठक में हुई धांधलियों के दस्तावेज़ क़ब्र में दबाए रखे जा सकें। दूसरे, भविष्य में एक पालतू लोकपाल बनाया जा सके। इस प्रकार भविष्य में केजरीवाल द्वारा संकेत की गई जीत की राजनीति परंपरागत राजनैतिक दलों से चुनावी सन्धियाँ करने को भी स्वतंत्र हो गईं। सरकार के मार्फ़त चंदा वसूलने का ताकतवर हथियार भी अब जेब में ही है। नए फ़लैट्स और चमचमाती गाड़ियों की शुरुआत हो ही चुकी है।

राष्ट्रीय परिषद् की मीटिंग के 5 दिन पहले ही सारी भंग और अॅड हॉक ज़िला और राज्य इकाइयों को पुनर्जीवित करके परिषद् में अपनी अनैतिक मनमानी का जुगाड़ कर लिया गया। इतना ही पर्याप्त नहीं था, बल्कि कई व्यूह रचना के तहत केवल 4 राज्यों के ही ज़िला, ज़ोन और राज्य स्तर के सदस्यों को परिषद् सदस्य के तौर पर बुलाया गया। इन राज्यों में अरविन्द गुट के सिपहसालारों का दबदबा है। इस तरह के आमंत्रित सदस्य केवल दया पर आश्रित हैं। चक्रव्यूह की तीसरी लेयर के तहत इन सभी सदस्यों को वोटिंग राइट्स भी दे दिए गए — जो कि पार्टी संविधान के विरुद्ध है। यह भी ध्यान रहे की इन्हीं चार राज्यों में सिपहसालारों ने ताबड़तोड़ दौरे भी किए थे। आख़िर अन्य राज्यों के इस श्रेणी के सदस्यों को क्यों नहीं बुलाया गया?

चक्रव्यूह की अगली परत के तहत बहुत से परिषद् सदस्यों को — जो चुनाव आयोग में जमा किए गए दस्तावेजों के अनुसार फाउंडर मेंबर भी हैं — को बैठक में बुलाया ही नहीं गया। यहाँ मैं उन लोंगो की बात नहीं कर रहा हूँ जो लोग इस्तीफ़ा दे कर जा चुके हैं। परिषद् सदस्यों की सूची पार्टी द्वारा वेबसाइट पर पिछले 4 सालों से न ड़ाल पाने की वजहें अचानक 1 फ़्लैश की तरह स्पष्ट हो गईं।

परिषद् की बैठक में विधायकों के आने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं था। उन्हें अतिथि की तरह आमंत्रित किया गया। लेकिन विधायको ने आतंकित करने, माहौल में उत्तेजना पैदा करने, टेम्पो सेट करने आदि का काम किया। कुछ विधायकों ने मिल कर पितातुल्य और वयोवृद्ध नेता शांति भूषण पर हाथ उठाया थप्पड़ मारने की मुद्रा में, उन्हें दीवार से भेद दिया तथा कमर के नीचे मुक्कों से मारा भी। इन्हें यहाँ से उठा कर बाहर फेंक दिया जाए ऐसी आवाज़ें भी बुलंद की गईं। प्रशांत भूषण को तो थप्पड़ मार भी दिया गया।

पूरी मीटिंग पहले से ही कूट रचना के तहत एक कैरम बोर्ड की तरह सेट थी। सभा स्थल के बाहर बसों में विधायक समर्थको को भर कर लाए थे, जिनका काम भय और उत्तेजना का माहौल बाहर से ही पैदा करने का था। सुरक्षा और जाँच के पहले गेट पर ही दो बार जाँच, फिर दुसरे चेक पॉइंट पर फिर जाँच, फिर तीसरे चेक पॉइंट पर जाँच, फिर चौथे रजिस्ट्रेशन पॉइंट पर मोबाइल, घड़ी, पेन, इत्यादि भी जमा करा लिए गए। फिर पाँचवे पॉइंट पर मेटल डिटेक्टर और जाँच, फिर जूते भी सभा कक्ष से पहले उतरवाए गए। अंदर का सत्य किसी भी तरह बाहर न आ सके, उसके जबरदस्त उपाय थे। सभा कक्ष से सटे हुए एक दूसरे कक्ष में तथाकथित प्रस्ताव का बम तैयार हो रहा था जो पूर्वघोषित एजेंडा का हिस्सा नहीं था। जिन मुद्दों को सदस्यों ने अजेंडे में शामिल करने का बाक़ायदा अनुरोध किया था पार्टी सेक्रेटेरी से मेल पर — उन्हें छुआ तक नहीं गया।

वरिष्ठ और विचारधारा के प्रति निष्ठावान नेताओं को निकले जाने का तथाकथित प्रस्ताव बम पर कुछ सदस्यों को किनारे ले जा कर धोखे से हस्ताक्षर कराए जा रहे थे। पहले पन्ने पर ऊपर प्रस्ताव था। कई पन्नों पर नंबरिंग थी। दूसरे पेज पर हस्ताक्षर कराए जा रहे थे। कइयों ने इस छल पत्र पर विश्वास में हस्ताक्षर कर दिए। कुछ सदस्यों को पार्टी पोस्ट इत्यादि का लालच दे कर और कुछ सदस्यों को धमका कर कि “तुम्हारी औक़ात क्या है?”

मुझे भी नई दिल्ली रैलवे स्टेशन पर उतरते ही संजय सिंह जी से बात कराई गयी — आदर्श के फ़ोन से। सिंह ने तुरंत मुझसे होटल में ही मिलने की इच्छा व्यक्त की। स्टेशन से लगे हुए इलाक़े पहाड़गंज में मैं रुका था। चेक-इन करने के बाद जैसे ही मैं रूम में पहुँचा कि मुझे फ़ोन आ गया कि मैं अजमेरी गेट की तरफ़ पहुँच कर संजय से मिल लूँ। 3 गाड़ियाँ आदमियों से भरी खड़ी हैं। सीरियस मुआमला है। मैंने कहा कि मुझे आने में देर लगेगी। लेकिन प्रबंधन की तेज़ी इतनी ज़्यादा थी कि एक गाड़ी मुझे लेने के लिए भेजी गई और गाड़ी चालक ने मेरे साथ लगातार फ़ोन पर संपर्क बनाए रखा।

जब मैं अजमेरी गेट की तरफ़ स्टेशन परिसर में पहुँचा तो मुझे एक नई लक्ज़री गाड़ी में संजय के साथ बिठाया गया और हम चल पड़े। वार्ता में मेरे सवालों के जवाब नदारद थे। लालच का पासा फेंका गया। गर्मजोशी भी। उस रात मैं सुबह 4:30 बजे सो पाया।

कैरम बोर्ड सेट था। स्ट्राइकर-रूपी माइक केजरीवाल के हाथ में था। सट-सट सारी गोटियाँ जैसे भावनात्मक उत्तेजना पैदा करना, अपना भावुक अर्ध-सत्य, आरोपों की बारिश… वीडियो आपने देखा ही होगा। मीटिंग का कैमरा नियंत्रित, निर्देशित और प्रशिक्षित था। स्वयंसेवको के नाम पर बाउंसर क़िस्म के लोग — जो किसी भी बोलने वाले को पहले प्यार से फिर फटकार से फिर बाहर ले जा कर जूतम लात से नियंत्रित कर रहे थे। विधायको की पूर्वनिर्धारित रणनीति के तहत गुंडागर्दी और नेताओं की मंच से निरपेक्षता का अभिनय, लेकिन केजरीवाल की सधी हुई चुप्पी कैरम बोर्ड पर पाउडर का काम चल रहा था।

फिर केजरीवाल ने तथाकथित प्रस्ताव-रूपी बम निकाला जो अजेंडे में नहीं था। कहा, चुन लें केजरीवाल या… इन लोगों को निकाला जाए। दूसरे पक्ष की कोई बात सुनने का अवसर ‘परिषद्’ को नहीं मिला। आरोप भी केजरीवाल के, ‘जाँच’ भी केजरीवाल की ‘प्रस्ताव’ और ‘परिषद्’ भी केजरीवाल की, माथे पर गद्दार का लेबल चिपकाया और भीड़ ने पत्थर मार कर फंदा गले में डालकर 5 निष्ठावान, विचारशील, प्रगतिशील, लक्ष्यों और आदर्शों के प्रति समर्पित वरिष्ठ नेताओं को सूली पर चढ़ा दिया। शायद अभिमन्यु भी कौरवो द्वारा ऐसे ही मारा गया होगा।

आंदोलन से पार्टी, पार्टी से जागीर, जागीर से बपौती — दिशा का संकेत बोर्ड भविष्य की ओर इशारा कर रहा है। बैठक में शामिल मेरे क्रान्तिकारी साथी डीलर्स बन कर, धृतराष्ट्र, शकुनि, भीष्म, दुर्योधन के चरित्रो को पुनः अर्थ दे गए। न्याय की देवी का चीरहरण फिर से हुआ। अभिमन्यु फिर से मारा गया। आम जनता के अपहृत स्वप्नों की हत्या फिर से हुई। एक और आंदोलन की मौत! शायद हमारे बुज़ुर्ग और अनुभवी नेता ने आने वाले भविष्य के क़दमों की आहट पहले से ही सुन ली थी, इसीलिए वो केजरीवाल जी को चुनाव के समय कमज़ोर करना चाहते थे। क्या केजरीवाल जी जैसा नेता एक जन लोकपाल जैसी सख़्त व्यवस्था में काम कर सकता है जो अपने साथी नेताओं की क्रिटिकल विवेचना पर आधारित आलोचना और सुझावों तक को बर्दाशत नहीं कर पाया? जन लोकपाल को कहाँ-कहाँ लात पड़ती उसका अनुमान लगाया जा सकता है। फिर से लालुओं, भालुओं, कालुओं का जन्म हुआ। हाय रे दुर्भाग्य!

लेखक आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य और राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य हैं। यहाँ उनका नाम बदल दिया गया है ताकि इस लेख से पार्टी में उनकी भूमिका पर आँच न आए।

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