राम मंदिर का रास्ता संसद से होकर ही जाएगा — विहिप

0
22

नई दिल्ली  —  विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री चंपत राय का मानना है कि राम मंदिर निर्माण का मार्ग अंततः संसद से होकर ही निकलेगा। 6 दिसम्बर (शौर्य दिवस) के रजत जयंती वर्ष पर विहिप के महामंत्री ने कहा कि उस आंदोलन से हिन्दू स्वाभिमान जागृत हुआ है, वह आज सर्वत्र प्रकट हो रहा है। हिन्दुस्थान समाचार के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख जितेन्द्र तिवारी को दिए गए विशेष साक्षात्कार में चंपत राय ने कांग्रेस को भी कटघरे में खड़ा किया। यहां प्रस्तुत हैं उस बातचीत के मुख्य अंश —

हि.स. — 25 साल में अयोध्या आंदोलन किस मुकाम तक पहुंचा है ?

चंपत राय — इस बीते कालखंड में हिन्दुस्थान के नौजवानों में अपने खोए स्वाभिमान को वापस पाने की एक ललक पैदा हुई है। हम यही चाहते थे। उस कालखंड में यहां-वहां विदेशी आक्रांताओं की निशानियां देखकर मन में एक टीस पैदा होती थी। खासकर मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के जन्मस्थान पर भी गुलामी की याद दिलाने वाला कलंक दिखाई पड़ता था। उस कलंक को समाप्त करने में ही हिन्दुस्थान का गौरव था। उस आंदोलन का ही परिणाम दिखाई दे रहा है कि पूरे भारत का ही नहीं, विश्व का हिन्दू समाज स्वाभिमान के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। उसका प्रकटीकरण हर क्षेत्र में हो रहा है।

हि.स. — अब आपकी मुस्लिम समाज से क्या अपेक्षा है?

चंपत राय — भारत में और अन्य देशों में भी भारत मूल के जो भी इस्लाम के अनुयायी हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि किसी कालखंड में हमारे पूर्वज राम और कृष्ण की उपासना किया करते थे। यहां रहने वाले इस्लाम के अनुयायियों को अच्छी तरह से पता है कि उनके पूर्वज भी उन्हीं परम्पराओं का पालन करते थे जिसे आज सनातन संस्कृति कहा जाता है, हिन्दू संस्कृति बताया जाता है। बीच में एक कालखंड ऐसा भी आया कि किसी मजबूरी या लाचारी में उनके पूर्वजों ने अपने नाम बदले, दूसरे धर्म के ग्रंथ को अपना लिया। आज वह मजबूरी या लाचारी समाप्त हो गई है। ऐसे में भारतीय या भारत मूल के मुसलमानों को समझना चाहिए कि आज किसी विदेशी या आक्रांता को अपना पूर्वज या महापुरूष मानने की उनके सामने कोई मजबूरी नहीं है। मुसलमानों की उपासना पद्धति को लेकर हमारे मन में कोई संशय नहीं है। वे जैसे चाहे वैसे रीति-रिवाज अपनाते रहें, हमें कोई हर्ज नहीं। पर अपने पूर्वजों और आदर्शों के बारे में मुस्लिम समाज को अब खुलकर सामने आना चाहिए। कुछ लोग तो स्वीकारने भी लगे हैं। कश्मीर के फारुख अब्दुल्ला भले कैसे भी राजनीतिक बयान देते रहते हैं पर यह बात स्पष्ट तौर पर स्वीकार करते हैं कि वे और उनके पूर्वज कश्मीरी पंडित ही थे और हैं।

हि.स. — अयोध्या में मंदिर का निर्माण जल्द शुरू होगा, ऐसी बातें बहुत की जा रही हैं, पर विवाद का समाधान तो अब तक नहीं हुआ है।

चंपत राय — समाधान के लिए हम सब एक बार फिर मुस्लिम वर्ग से आग्रह करते हैं कि वे अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर से अपना दावा छोड़ दें। स्वेच्छा से आगे बढ़कर रामलला की हिन्दू समाज को सौंप दें। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय से ही यह बात पूरी तरह से स्थापित हो चुकी है कि वहां मंदिर तोड़कर एक ढ़ांचा खड़ा किया गया था। इसके बाद तो कोई विवाद बचना ही नहीं चाहिए था। सबको समझना होगा कि वह केवल मंदिर नहीं है, श्रीराम की जन्मभूमि है। जन्मभूमि का स्थान बदला नहीं जा सकता। इसलिए मुस्लिम समाज के कथित पैरोकारों को चाहिए कि वे न्यायालय से अपना दावा वापस लेकर एक मिसाल पैदा करें।

हि.स. — लेकिन न्यायालय में तो कल (5 दिसम्बर) मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से पेश हुए कपिल सिब्बल ने इसे और लंबित करने की दलील दी!

चंपत राय — कल सर्वोच्च न्यायालय में कपिल सिब्बल और राजीव धवन ने जिस तरह का व्यवहार किया, ऐसा दृश्य उत्पन्न करने की कोशिश की जैसे वह देश का सबसे बड़ा न्याय का मंदिर न होकर कोई बाजार का सा स्थान हो। यह बहुत दुःखद है। कपिल सिब्बल और राजीव धवन की दलीलों से स्पष्ट है कि वे वहां किसी मामले की कानूनी लड़ाई न करके अपने राजनीतिक दल कांग्रेस का एजेंडा पेश करने आए थे। कांग्रेसी वकीलों की दलीलों से साफ है कि कांग्रेस का उद्देश्य देश की किसी भी समस्या के किसी भी तरह का समाधान करना नहीं है। किसी भी विवाद को हल होने देने से कांग्रेस का राजनीतिक हित नहीं सधता तो वह उसका समाधान नहीं होने देगी। जहां तक राम जन्मभूमि की बात है तो यह कांग्रेस के लिए हिन्दुओं को अपमानित कर मुसलमानों का तुष्टीकरण कर उनका वोट बैंक हासिल करने का मुद्दा बन गया है।

हि.स. — अब जबकि मामला न्यायालय में है और उसके लटके रहने की संभावना है तो आप राम मंदिर का निर्माण कब तक शुरू होने की संभावना बता सकते हैं?

चंपत राय — राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में अब न्यायालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम सबने ही संविधान सम्मत न्याय की एक व्यवस्था का निर्माण किया है। हमें उस संवैधानिक व्यवस्था का आदर करना चाहिए, उस पर भरोसा रखना चाहिए। इस कानूनी प्रक्रिया के बाद देश के संसद की भूमिका शुरू होगी।

हि.स. — तो क्या उसके बाद भी आप संसद में कानून के जरिए राम मंदिर का विकल्प देख रहे हैं?

चंपत राय — मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं कि कानून के जरिए हो या बातचीत से, राम मंदिर का रास्ता अंततः संसद से होकर ही जाएगा। वही एक रास्ता है।

                                                                                                                                   हिन्दुस्थान समाचार/जितेन्द्र तिवारी

Advt