4 दशकों से हनुमान मंदिर में पूजा करवा रहा है यह मुसलमान

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बेंगलूरू — साम्प्रदायिकता एवं एकता की एक नई मिसाल विजयपुरा जिले के डोमानल गांव में देखने को मिली है। विगत 4 दशकों से यहां के हनुमान मंदिर में एक मुसलमान पुरोहित के रूप में पूजा-अर्चना करवा रहे हैं। मज़हबी दीवारों को धराशयी करते उनके विचार मानवीय संवदेना को न केवल झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं, बल्कि साम्प्रदायिक एकता की जीती जागती मिसाल भी हैं।

महबूब साहब नदफ गांव के अन्य लोगों की ही भांति एक आम इंसान हैं, लेकिन उनकी सोच की परवाज इतनी बुलंद है कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। भगवान हनुमान उनके आराध्य हैं और वे 40 साल से अनवरत मंदिर में पूजा अर्चना करा रहे हैं। उनके लिए हिन्दू पंथ और इस्लाम दोनों एक ही समान हैं। उनमें कोई अंतर नहीं है। उनका अकीदा दोनों मजहबों में है। वह दोनों ही धर्मों को मानते हैं। उनकी राय में कोई भी धर्म श्रेष्ठ अथवा निम्न नहीं होता। सभी धर्म एक समान हैं।

दर्शन ज्ञान के पिपासु महबूब साहब पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में स्थित भगवान मल्लिकार्जुन मंदिर भी नियमित रूप से जाते हैं। हिमालय का भी उन्होंने दौरा किया है और अपनी ज्ञान क्षुधा को शांत करने के लिए वह कई धार्मिक विभूतियों और महान पुराहितों से लगातार मिलते रहते हैं।

महबूब साहब मूल रूप से विजयपुरा जिलान्तर्गत इंदी तालुक के इंगलालगी गांव के रहने वाले हैं। 40 साल पहले उनका परिवार डोमानल गांव चला आया था। गांव के लोग महबूब साहब की इंसानियत और नेक नियती से इस कदर प्रभावित रहे हैं कि उन्होंने उन्हें सर्वसम्मति से ग्राम पंचायत का सदस्य भी निर्वाचित कर दिया है।

रमजान के पावन महीने में महबूब साहब अपने मुसलमान धर्मानुसार सारी विधियों — मसलन रोजे रखना, नमाज पढ़ना, इत्यादि — पर उतनी ही तन्मयता से अमल करते हैं जितनी श्रद्धा से वह हनुमान जी की पूजा करते हैं। हनुमान जी के प्रति उनके श्रद्धाभाव को देखकर न सिर्फ गांव वाले, बल्कि आस-पास के गांवों के लोग भी उनका बहुत आदर करते हैं। लोगों का कहना है कि कोई भी अस्वस्थ, बीमार व्यक्ति जब मंदिर पहुंचता है, और महबूब साहब हनुमान जी का धागा उसे बांध देते हैं तो वह व्यक्ति बहुत जल्द चंगा हो जाता है।

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